तत्त्वमीमांसा दर्शन की प्रमुख शाखाओं में से एक है। यह अस्तित्व, वास्तविकता, समय, स्थान, कारण-कार्य संबंध, पहचान तथा जगत के मूलभूत सिद्धांतों का अध्ययन करती है। इसका उद्देश्य उन प्रश्नों का उत्तर खोजने का प्रयास करना है जिन्हें केवल अनुभव या वैज्ञानिक निरीक्षण से नहीं, बल्कि तर्क, चिंतन और दार्शनिक विश्लेषण के माध्यम से समझा जा सकता है।
तत्त्वमीमांसा (Metaphysics) शब्द की उत्पत्ति प्राचीन यूनानी अभिव्यक्ति ta meta ta physika से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “भौतिकी (Physics) के बाद आने वाले ग्रंथ”। अरस्तू की रचनाओं का संकलन करते समय उनके उन ग्रंथों को, जिनमें अस्तित्व, प्रथम कारण और वास्तविकता के मूल सिद्धांतों की चर्चा की गई थी, भौतिकी के बाद रखा गया। इसी कारण बाद के विद्वानों ने उन्हें Metaphysics नाम दिया। स्वयं अरस्तू ने इस अध्ययन को “प्रथम दर्शन” (First Philosophy) कहा था।
समय के साथ तत्त्वमीमांसा का अर्थ केवल “भौतिकी के बाद” रखे गए ग्रंथों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह दर्शन की उस शाखा का नाम बन गया जो अस्तित्व, वास्तविकता और ब्रह्मांड के अंतिम स्वरूप का अध्ययन करती है। प्लेटो, अरस्तू, देकार्त, लाइबनिट्स और इमैनुएल कांट जैसे दार्शनिकों ने इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया, और आज भी यह दर्शन के सबसे महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्रों में से एक मानी जाती है।
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नीचे दी गई तत्त्वमीमांसा संबंधी पुस्तकों की सूची इस वेबसाइट के दस्तावेज़ संग्रह का हिस्सा है। इसमें केवल वे अंग्रेज़ी पुस्तकें शामिल की गई हैं जिन्हें निःशुल्क डाउनलोड करने की अनुमति है।
The Metaphysics of Aristotle / Author: Aristotle / From: Public domain
Time, Change and Freedom: An Introduction to Metaphysics / Author: Quentin Smith / From: Università degli Studi di Milano Statale
What is metaphysics? / Author: Kit Fine / From: iaoa.org
कांट के अनुसार इच्छाशक्ति वह क्षमता है जिसके द्वारा मनुष्य किसी नैतिक नियम की अवधारणा के अनुसार कार्य करता है। जब हम कोई कार्य करते हैं, तब उसका परिणाम हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होता। इसलिए किसी कर्म का नैतिक मूल्य उसके परिणाम पर नहीं, बल्कि उस कर्म के पीछे निहित इच्छाशक्ति और प्रेरणा पर निर्भर करता है। मनुष्य नैतिक नियम के अनुसार भी कार्य कर सकता है और उसके विरुद्ध भी; यही चुनाव नैतिक मूल्यांकन का आधार है।
कांट का प्रसिद्ध कथन है कि “बिना किसी शर्त के केवल सद्इच्छा ही पूर्णतः अच्छी है।” साहस, बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, धन और अन्य गुण अपने आप में मूल्यवान हो सकते हैं, किंतु उनका उपयोग अच्छे या बुरे दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है। इसलिए वे अपने आप में पूर्णतः अच्छे नहीं हैं। यहाँ तक कि सुख भी तभी वास्तविक अच्छाई माना जा सकता है जब वह सद्इच्छा के साथ जुड़ा हो। इस प्रकार, परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, सद्इच्छा अपना नैतिक मूल्य कभी नहीं खोती।
कांट यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल कर्तव्य के अनुरूप कार्य करना पर्याप्त नहीं है; किसी कर्म का नैतिक मूल्य तभी होता है जब वह कर्तव्य के प्रति सम्मान की भावना से किया जाए। उदाहरण के लिए, यदि कोई दुकानदार केवल अपनी प्रतिष्ठा या व्यापारिक लाभ बनाए रखने के लिए ग्राहकों के साथ ईमानदारी से व्यवहार करता है, तो उसका आचरण कर्तव्य के अनुरूप अवश्य है, परंतु उसका नैतिक मूल्य सीमित है। इसके विपरीत, यदि वह केवल इसलिए ईमानदार है क्योंकि ईमानदारी नैतिक रूप से सही है, तो उसका कर्म वास्तविक नैतिक मूल्य प्राप्त करता है।
इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति दूसरों की सहायता केवल इसलिए करता है क्योंकि उसे ऐसा करना स्वाभाविक रूप से अच्छा लगता है, तो उसका कार्य प्रशंसनीय अवश्य है; किंतु कांट के अनुसार उससे भी अधिक नैतिक मूल्य उस व्यक्ति के कार्य का है जो अपनी व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर केवल कर्तव्य के सम्मान में दूसरों की सहायता करता है। नैतिकता मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियों पर नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्र और विवेकपूर्ण इच्छाशक्ति पर आधारित होती है।
हम प्रायः यह मान लेते हैं कि किसी कार्य का उद्देश्य यदि लोगों को सुख पहुँचाना या समाज का कल्याण करना है, तो वही उसे नैतिक बनाता है। किंतु कांट के अनुसार किसी कार्य की नैतिकता उसके परिणामों से निर्धारित नहीं होती। अच्छे इरादों वाले कार्य भी कभी-कभी प्रतिकूल परिणाम दे सकते हैं, और संयोगवश अच्छे परिणाम भी उत्पन्न हो सकते हैं। इसलिए किसी कर्म का वास्तविक नैतिक मूल्य उसके परिणाम में नहीं, बल्कि उस सद्इच्छा में निहित है जिससे वह किया गया हो, अर्थात् ऐसी इच्छाशक्ति जो विवेक द्वारा निर्देशित हो और नैतिक कर्तव्य का सम्मान करती हो।
इमैनुएल कांट (1724–1804) पश्चिमी दर्शन के इतिहास के सबसे प्रभावशाली दार्शनिकों में से एक थे। तत्त्वमीमांसा, ज्ञानमीमांसा, नैतिक दर्शन तथा सौंदर्यशास्त्र में उनके योगदान ने आधुनिक दर्शन की दिशा को गहराई से प्रभावित किया।
उनकी महान कृति शुद्ध बुद्धि की समालोचना (Critique of Pure Reason, 1781; संशोधित संस्करण 1787) का मुख्य प्रश्न था: “हम क्या जान सकते हैं?” कांट का तर्क था कि मानव ज्ञान केवल अनुभव-संभव जगत तक सीमित है। समय और स्थान हमारे अनुभव के मूल रूप हैं, जबकि बुद्धि की पूर्वानुभविक (a priori) संरचनाएँ अनुभव को व्यवस्थित करती हैं। इसलिए ईश्वर, आत्मा या ब्रह्मांड की अंतिम प्रकृति जैसी वस्तुओं का निश्चित ज्ञान केवल सैद्धांतिक बुद्धि के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता।
इसी विचारधारा ने कांट के अतीन्द्रिय दर्शन (Transcendental Philosophy) की नींव रखी और आधुनिक दर्शन के विकास में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। बाद की कृतियों, जैसे व्यावहारिक बुद्धि की समालोचना तथा निर्णय शक्ति की समालोचना, ने नैतिक दर्शन और सौंदर्यशास्त्र को भी नई दिशा प्रदान की।